Translate

गीताप्रेस

गीताप्रेस



अपनी आध्यात्मिकता, पवित्रता, गुणवत्ता, कम मूल्य और त्रुटि रहित प्रकाशन के लिए पहचानी जाने वाली गीताप्रेस आज दुनिया की सबसे बड़ी धार्मिक पुस्तकों की प्रकाशक है | गीताप्रेस की स्थापना सन् 1923 में गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में श्री ब्रह्मलीन जय दयाल जी गोयन्दका द्वारा की गई, इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य श्रीमद्भगवतगीता को कम से कम दाम में घर-घर तक पहुँचाना और लोगो में भलाई, जीवन की बेहतरी और सुख-शांति का भाव जगाना था | शुरुआत में एक छोटी सी दुकान से शुरू हुई प्रेस के अंतर्गत आज 32 एकड़ भूमि है | गीताप्रेस की प्रसिद्धि का एक कारण यह भी है की प्रकाशन के समय प्रत्येक पुस्तक की पवित्रता का सम्पूर्ण ध्यान रखा जाता है जैसे : कार्यालय में जूते-चप्पल पहनना वर्जित है, पुस्तकों की बाइंडिंग के लिए जानवरों की चर्बी से बने गोंद की जगह सिंथेटिक गोंद का इस्तेमाल करना, पुस्तकों के छपने के पश्चात उन्हें ज़मीन पर न रखना आदि | गीताप्रेस की सफलता के पीछे गोयन्दका जी के मौसेरे भाई श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (जिन्हे प्यार से भाईजी कहकर बुलाते थे) का भी बहुत बड़ा हाथ है उन्होंने गीताप्रेस की बागडोर अपने हाथ में ली, साथ ही साथ वे अपनी धार्मिक मासिक पत्रिका 'कल्याण' का भी संपादन करते रहे और लोक कल्याण और धार्मिक ग्रंथों के प्रचार-प्रसार में अपना जीवन व्यतीत किया |

आज भी गीताप्रेस अपने व्यवसाय में विज्ञापन और दान स्वीकार नहीं करती | जितना भी घाटा प्रेस को होता है उसकी भरपाई गोबिंद भवन संस्थान (जो गीताप्रेस की संचालक संस्थान है) की अन्य इकाइयों की आय द्वारा होती है | आज के इस युग में जहाँ धन की महत्ता बहुत है परन्तु गीताप्रेस के लिए ज्ञान का प्रचार-प्रसार ही हमेशा से सर्वोपरि रहा इसीलिए प्रेस की सारी ही पुस्तकें निम्नतम मूल्य में उपलब्ध कराई जाती है ताकि सभी लोग हमारे वेद, उपनिषद्, गीता, रामायण आदि का संज्ञान ले सके और अपने जीवन को और सुखद और शांतिप्रिय बना सके | 

इसी साल 29 अप्रैल को गीताप्रेस ने अपनी स्थापना के सौ वर्ष पुरे किए, और इसी प्रकार मानव मात्र के हित में सेवारत् गीताप्रेस को मेरा सादर प्रणाम | 🙏

धन्यवाद,
सार्थक खोड़े 

Recent Post

The Successful Failure

Popular Posts