भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा

भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा  




एक राष्ट्र जो रचनात्मकता, कलात्मकता, और आध्यात्मिकता का पर्याय है | वह भूमि जो अनेकों साधु-संतों, महात्माओं, एवं बुद्धिजीवियों के ज्ञान से सिंचित हो, जहां प्राकृतिक एवं पौराणिक सम्पदा की भरमार हो और 'वसुधैव कुटुम्बकम' का भाव जन-जन के ह्रदय में समाहित हो- यही हमारा भारत है | वह देश जो पुरे विश्व में अपनी विवधता के लिए विख्यात है, और इसी विविधता का अभिन्न अंग है हमारी भाषा- हिंदी, जो सिर्फ एक भाषा ही नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, मूल्यों, परम्पराओं एवं विचारधारा की संवाहक भी है |

हिंदी काफी प्राचीन भाषा है, समय के साथ-साथ हिंदी भी कईं बदलावो के दौर से गुज़री | वैदिक संस्कृत- जिसे हिंदी का सबसे पुराना पूर्वज माना जाता, फिर धीरे-धीरे प्राकृत भाषा विकसित हुई, जो आम लोगों की बोलचाल में काफी प्रयोग होती थी | मध्यकाल (आंठवी से बारहवीं शताब्दी का समय) में हिंदी के प्रारंभिक रूप का प्राकट्य हुआ जिसे 'हिंदवी' नाम से पहचाना गया, और ख़ास बात यह है की आधुनिक मानक हिंदी और उर्दू, दोनों ही हिंदवी से विकसित हुई है | अगर हम पूर्व-आधुनिक हिंदी (बारहवीं से अट्ठारहवीं शताब्दी) के दौर में बढ़ें, तो हमें यहां अहम बदलाव देखने को मिलेंगे | मुग़ल, फ़ारसी, एवं तुर्की के आक्रांताओं के भारत पर आक्रमण करने से हिंदी भाषा में बहुतायत मात्रा में फ़ारसी और अरबी शब्दों का उपयोग होने लगा | इसी अवधि में हिंदी की विभिन्न बोलियां एवं क्षेत्रीय भाषाओं ने तूल पकड़ा और भक्ति काव्य, कवितायेँ, आदि की रचनाएँ ब्रजभाषा, अवधी, मैथिली में होने लगी, इन्ही क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों में कई महाकवियों, कवियत्रिओं, ग्रंथकारों ने अपनी रचनाएँ की जैसे- गोस्वामी तुलसीदास कृत 'रामायण' अवधी भाषा में सृजित है, श्रीकृष्ण भक्त मीराबाई के दोहे ब्रजभाषा और भक्ति का एक अनोखा संगम है | मुग़ल साम्राज्य का पतन हिंदी और उर्दू दोनों के विभेदीकरण का कारण बना, जिस किस्म ने फ़ारसी और अरबी शब्दों को अपनाया, वह उर्दू भाषा कहलायी और 'नस्तलीक़ लिपि' में लिखी गई | और जिसने संस्कृत और देशी स्रोतों को आकर्षित किया वह हिंदी भाषा के रूप में उभरी, और इसे 'देवनागरी लिपि' में लिखा गया, एक ऐसी लिपि जिसने हिंदी के साथ-साथ मराठी, कोंकणी, नेपाली को भी  अपनी अनोखी लिखित शैली में पिरोया | देवनागरी- जिसका शाब्दिक अर्थ "देवताओं के नगर की लिपि" या "शहरों की दिव्य लिपि" हैं | यह लिपि विशेषताओं से परिपूर्ण है जैसे- ध्वनिकता, यानी जैसे शब्दों को लिखा जाता है वैसे ही पढ़ा जाता है, जिसमे प्रत्येक ध्वनि के लिए निश्चित वर्ण है, 'शिरोरेखा' अर्थात एक क्षैतिज रेखा जो अक्षरों के ऊपर खींची जाती है जो उन्हें एक इकाई के रूप में पढ़ने में सहायक होती है, 'अक्षरात्मक लिपि' जिसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यंजन में मूल रूप से '' स्वर जुड़ा होता है, 'व्यापकता' यानी इस लिपि में ऐसी क्षमता है कि यह संस्कृत की प्राचीन ध्वनियों से लेकर आधुनिक हिंदी की सभी ध्वनियों को और यहाँ तक कि विदेशी भाषाओं से आई ध्वनियों (जैसे '', 'ज़', 'फ़') को भी नुक्ता लगाकर आसानी से व्यक्त कर सकती है। इन सभी विशेषताओं के अलावा  देवनगरी लिपि अपने कलात्मक सौंदर्य के लिए भी जानी जाती है जिसमे अक्षर अपनी गोलाई और सीधी लकीरों के कारण सुंदर माने जाते हैं।

आज जो हम हिंदी भाषा का प्रयोग करते है वह आधुनिक मानक हिंदी है, जिसके जनक भारतेन्दु हरिश्चंद्र को माना जाता है | कईं विद्वानों ने अपनी रचनाऐ आधुनिक मानक हिंदी के साथ दूसरी बोलियों में भी की परन्तु सभी के बारे में जान पाना यहाँ संभव नहीं है, पर इससे उनकी महत्ता कभी कम न होगी |आखिर में मै बस यही कहना चाहूंगा की हमारी संस्कृति और भाषा पर हमें गर्व होना चाहिए, क्योंकि यही है जो हमें फूलों की तरह एकजुट कर माला में पिरोती है |


धन्यवाद,
सार्थक खोड़े 

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