नीलगिरी का पुष्प
भारत- एक ऐसा देश जो अपनी जैव विविधता के लिए पुरे विश्वभर में जाना जाता है, हमारी धरा कई दुर्लभ जीव-जंतु, पेड़, एवं पौधों की धनि है | ऐसा ही एक अनोखा और काफी दुर्लभ पुष्प है 'नीलकुरिंजी' जो की नीलगिरी पर्वत श्रृंखला में पाया जाता है | यह फूल बारह सालों में केवल एक बार खिलता है, इसी कारण इसे भारत सरकार द्वारा संरक्षित प्रजाति की तीसरी अनुसूची में स्थान दिया गया है, जिसके अनुसार अगर कोई व्यक्ति इन्हें हानि पहुंचाता है तो उसे तीन साल तक का कारावास हो सकता है |मेरी तरह ही आपके दिमाग में भी यह सवाल कौंध रहा होगा की आखिर किस कारण से यह फूल इतने लम्बे अंतराल पर खिलते है, फिर मैंने तुरंत ही गूगल की ओर रुख किया और पाया की मौसमी गतिविधियाँ और जीवों से बचने के लिए एवं प्रकृति अनुसार ढलने के लिए इन फूलों के परागण (Pollination) में काफी समय लगता है, जिसके कारण यह हर बारह वर्ष पश्चात् खिलते रहते है |
'नीलकुरिंजी', यह नाम दो मलयाली शब्दों ; 'नील' यानी 'नीला', और 'कुरिंजी' अर्थात 'फूल' से मिलकर बना है | यह मनमोहक, लुभान्वित, नीले एवं बैंगनी पुष्प सितम्बर से दिसंबर की शुरुआत तक खिलते है, फिर बीज उत्पन्न कर मुरझा जाते है, और यही चक्र चलता रहता है | स्वास्थ्य के लिहाज़ से भी नीलकुरिंजी बहुत उपयोगी है, इन फूलों में कैंसर-विरोधी, दर्द-निवारक, एवं विभिन्न लाभदायक तत्वों की पुष्टि की गई जो शारीरिक समस्याओं का निवारण करने में समर्थ है, कईं शोधों में यह भी पता चला है की इन फूलों के रस द्वारा तैयार शहद 'कुरिंजीथन' के सेवन से हार्ट-ब्लॉकेज भी ठीक होते है |
पुरातन काल में कर्नाटक के पालियन समाज के लोगो द्वारा इन फूलों का इस्तमाल अपनी आयु का अनुमान लगाने में भी किया जाता था | ऐसा माना जाता है की 'नीलगिरी' अर्थात 'नीला पर्वत', का नाम भी इन्ही फूलों के रंग के कारण रखा गया है | 'नीलकुरिंजी' सिर्फ एक पुष्प नहीं बल्कि भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का पर्याय है और हमें इसे एवं अन्य दुर्लभ और अनुपम संपदाओं को सहेज रखना होगा ताकि हमारे देश की यह अद्भुत सुंदरता बरक़रार रह सके |
धन्यवाद,
सार्थक खोडे़ 😊
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