महाकाल और अवंतिका

शिव



शिव- यानि शुभ एवं कल्याण करने वाला | हमारे देश में शिव जी को कईं अवतारों में पूजा जाता है जैसे- भोलेनाथ, श्री नटराज, अर्धनारीश्वर आदि, परन्तु रूप चाहे जो भी हो भक्तों की आस्था सदा एक ही रहेगी | वैसे तो शिव अजर-अमर है जो श्रृष्टि की रचने से पहले भी थे और बाद में भी रहेंगे, परन्तु शिव जन्म से जुडी काफी मान्यताएं प्रचलित है, जिनमे से एक के अनुसार शिव का जन्म गाय के कर्णों (कानों) से हुआ था और आज यह स्थान गोकर्ण नाम से जाना जाता है, जो कर्णाटक में स्थित है | 

शिव अविनाशी, त्रिकालदर्शी, आदियोगी, और कालों के काल महाकाल है | शिव वो है जो समय से परे है, और शिव जी का यही अनुपम रूप मध्य प्रदेश के अवंतिका नगरी अर्थात उज्जैन में 'महाकालेश्वर' अवतार में विद्यमान है | यह ज्योतिर्लिंग अपने आप में काफी विशेष है, यह एकमात्र शिवलिंग है जिनकी आरती भस्म द्वारा की जाती है (भस्मारती), साथ ही साथ श्री महाकालेश्वर मंदिर भी अपने आप में ख़ास है | मंदिर को तीन तलों में बनाया गया है, जिसमे सबसे ऊपर भगवान 'नागचंद्रेश्वर' की प्रतिमा विराजमान है, यह तल एवं मंदिर वर्ष में केवल नागपंचमी के दिन श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है, वहीँ दुसरे तल में बाबा ओम्कारेश्वर स्थापित है, और भूतल में स्वयंभू (स्वयं प्रकट होने वाला) महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग गर्भगृह है | हर ज्योतिर्लिंग की तरह यहाँ जलस्रोत के रूप में रुद्रसागर तालाब एवं शिप्रा नदी है, जहाँ हर बारह वर्ष में कुम्भ मेला आयोजित होता है | 

बाबा महाकाल की नगरी अवंतिका यानी उज्जैन भी हिन्दू सप्तपुरियों में से एक है | महाराज विक्रमादित्य के शासन में उज्जैन (अवंतिका) दुनिया के बड़े और समृद्ध शहरों में शामिल था, उन्होंने सूर्य एवं तारों की स्थिति के अनुसार हमारा हिन्दू पंचांग बनवाया जो विक्रम संवत के नाम से जाना जाता है, और उन्ही के नवरत्नों में से एक महान खगोलविद वराहमिहिर थे जिन्होंने खगोल विज्ञान सम्बन्धी कईं खोजें की, साथ ही साथ उज्जैन का समय से भी गहरा नाता रहा है, पुरातन काल में विश्व समय का आधार ग्रीनविच (Greenwich Meridian) नहीं बल्कि उज्जैन था, जिसकी पुष्टि ग्रीक विद्वान टॉलेमी (Ptolemy) ने अपने लेखों में भी की है, राजपूत राजा जय सिंह II ने उज्जैन में समय मापन एवं खगोलिकि क्रियाओं के अनुसन्धान के लिए जंतर मंतर वेधशाला का निर्माण कराया जो पांच जंतर मंतर में से एक है (दिल्ली, जयपुर, वाराणसी, मथुरा और उज्जैन) | 

हमारी हिन्दू सभ्यता ऐसी ही अनेक अनोखी धरोहरों से सुसज्जित और हमे इन धरोहरों को सहेज कर रखना होगा ताकि हम आने वाली पीड़ी के लिए एक सुन्दर और गरिमामय भारत छोड़कर जाए | साथ ही साथ मै यह भी कहना चाहूँगा की हमें हमारी इतिहास की पुस्तकों  से मुग़लों, अंग्रेजों के अंश हटाकर हमारे भारत की धरोहरे, महान व्यक्तित्वों तथा क्रन्तिकारी एवं लाभदायक घटनाओं को जोड़ना होगा, तभी हम यह उम्मीद कर सकते है की भावी पीड़ी हमारे देश को जाने |

धन्यवाद, 
सार्थक खोडे़ 😊


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